Sambhog Kriya Me Mastishk Ki Mahatvapurn Bhoomika

Sambhog Kriya Me Mastishk Ki Mahatvapurn Bhoomika

संभोग क्रिया में मस्तिष्क की महत्वपूर्ण भूमिका-

संभोग क्रिया में सक्रिय भूमिका अदा करने वाला प्रमुख अंग शिश्न, शिश्न मुण्ड तथा योनि होती है। शिश्न का संचालन एवं नियंत्रण मांसपेशियां एवं तंत्रिकायें करती हैं, ऐसा समझ लेना भारी गलती होगी। कई विद्वान चिकित्सक लिंग पर कई प्रकार के लेप आदि करके लिंग की नपुंसकता का इलाज करते रहते हैं। जबकि शिश्न या लिंग की उत्तेजना मस्तिष्क, अंतःस्रावी ग्रंथियों के स्राव तथा इंगला-पिंगला नाड़ी के मध्य रहने वाली सुषुम्ना की क्रियाशीलता पर निर्भर करती है।

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यकृत, वृक्क, मूत्र-संस्थान से संबंधित सभी अंग तंत्रिका संस्थान एवं मस्तिष्क की क्रियाशीलता से अपना कार्य संपादित करते हैं। इसलिए इन अंगों की विकृति से संभोग क्रिया में भाग लेने वाले अंग भी निष्क्रिय हो जाते हैं और फलस्वरूप उत्पन्न होती है नपुंसकता।

पुराना कब्ज़ भी नपुंसकता को जन्म देती है। अधिकांश यकृत संबंधी रोगी कब्ज़ के शिकार भी पायें जाते हैं। पाचन दोष ग्रस्त रोगी भी धीरे-धीरे नपुंसकता के शिकार होते जाते हैं। दुख, कष्ट, शोक, चिंता-तनाव ग्रस्त रोगी कभी भी संभोग क्रिया से तृप्त नहीं हो पाता अर्थात् रोगी या तो चिंता-तनाव, शोक, कष्ट, दुख कर ले या संभोग क्रिया कर ले। दोनों कार्य एक साथ संभव नहीं है। मस्तिष्क एक समय में एक ही प्रकार के विचारों को दे सकता है, एक साथ दो-दो तीन-तीन विचारों की आज्ञा हमारा मस्तिष्क नहीं दे पाता। मस्तिष्क एक बार में एक ही प्रकार का कार्य सोच सकता है, विचार कर सकता है, आज्ञा दे सकता है?

दो प्रकार के विपरीत विचार कभी भी मस्तिष्क में एक साथ उत्पन्न नहीं हो सकते। दो प्रकार के विचारों में से एक को छोड़ना होगा, तभी एक कार्य पूर्ण रूप से सम्पन्न होगा। जैसे एक व्यक्ति किसी कारण से शोक, दुख, कष्ट से गुजर रहा है, ठीक उसी समय नायिका प्रणय निवेदन(संभोग का प्रस्ताव) कर दे, तो व्यक्ति यदि शोक-दुख, कष्ट में रहना चाहेगा अर्थात् शोक, दुख, कष्ट हावी होगा, तो वह प्रेयसी के प्रणय निवेदन पर किसी प्रकार का भी ध्यान नहीं देगा। यदि मस्तिष्क पर प्रेयसी का प्रणय निवेदन हावी होगा, तो वह एकाएक दुख-शोक, कष्ट हो भूलकर प्रेयसी के प्रणय के प्रति उत्साहित हो जायेगा। मस्तिष्क पर जिस भाव का अधिकार अधिक रहता है, व्यक्ति उसी भाव को अपनाता है। रोग का कारण भी यही होता है। जैसे उपरोक्त रोगों के कारण यौनांग, शिथिल पड़ जाते हैं। इसका भी कारण मस्तिष्क ही है।

कामवासना और मस्तिष्क-

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कामवासना का प्रथम संकेत मस्तिष्क के पास जाता है और वही संकेत उसके पश्चात् विभिन्न अंगों, नाड़ियों आदि से होता हुआ शिश्न तक जाता है, जिसके परिणामस्वरूप शिश्न कठोर हो जाता है। स्त्री को देखते ही अथवा स्त्री के कामांगों को देखते ही, स्पर्श करते ही अथवा कहीं से सुनते ही या फिर मैथुन संबंधी लिखी किताबें पढ़ते ही अथवा मैथुनरत या आकर्षक नखशिख वाली स्त्रियों के चित्र आदि देखते ही मस्तिष्क में कामवासना जागृत होती है। कामवासना का यह संकेत मस्तिष्क से सुषुम्ना तंत्रिका द्वारा कटिप्रवेश में पहुंचता है। सुषुम्नागत ऊर्जा से वीर्य गतिशील हो उठता है। संभोग की इच्छा जागते ही मस्तिष्क की ऊर्जा से वीर्य आकर्षित होकर अंडग्रंथि में संचित होने लगता है। अण्डग्रंथि में पहले से ही एक प्रकार का स्राव उपस्थित रहता है, उसको भी वीर्य ही कहा जाता है। इस प्रकार दोनों वीर्य संभोग क्रिया प्रारम्भ होते ही मिलकर एक हो जाते हैं। संभोग क्रिया सम्पन्न होते ही वीर्य, शिश्न मुंड के छिद्र से बाहर निकल जाता है।

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अति दुर्बल-कमजोर, कृशकाय मनुष्यों का वीर्य जब निकलता है, तब उनके शरीर में एक प्रकार का खिंचाव-सा उत्पन्न होता है। अत्यधिक मैथुन करने वाले पुरूषों के शरीर में भी ऐसा तनाव उत्पन्न होता है। लेकिन जो लोग कम संभोग करते हैं, उनके शरीर में ऐसा खिंचाव या तनाव वीर्य स्खलित होते समय नहीं निकलता। बल्कि वीर्य बिना तनाव के ही स्खलित हो जाता है। कई बार तो ऐसे लोगों का पता भी नहीं चल पाता कि उनका वीर्य स्खलित हो चुका है। वीर्य का स्खलन होने के उपरान्त शिश्न शीतल पड़ जाता है।

नपुंसकता आ जाने पर शिश्न बिना वीर्य स्खलित हुए ही एकाएक संभोग क्रिया के मध्य शिथिल पड़ जाता है। इसके कई कारण हो सकते हैं- अनजाना भय जो रोगी को खुद की कमजोरी प्रति रहता है। वह संभोग क्रिया के मध्य एकाएक आ जाता है और संभोग क्रिया का संबंध मस्तिष्क से कट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप शिश्न एकाएक बिना वीर्य स्खलित किए ही शिथिल हो जाता है।

सफल संभोग क्रिया मस्तिष्क, शिश्न एवं योनि द्वारा सम्पन्न कराता है, कहा जाये तो गलत नहीं होगा। मस्तिष्क की आज्ञा के बिना शिश्न में उत्तेजना आना संभव नहीं है। मस्तिष्क की आज्ञा के बिना काम भावना जागृत नहीं होती। साथ ही मस्तिष्क की आज्ञा के बिना पुरूष एवं स्त्री दोनों मैथुन क्रिया में रत भी नहीं हो सकते। मस्तिष्क के अलावा काम अंगों की विकृति, अवरोध आदि भी दोषी हो सकते हैं, जो नपुंसकता उत्पन्न कर मैथुन क्रिया को असफल कर रोगी के अंदर निराशा उदासीनता उत्पन्न कर सकते हैं।

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