Sambhog Ka Tarika

Sambhog Ka Tarika

संभोग का तरीका

संभोग(Sexual Intercourse)

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संभोग एक उम्र में की जाने वाली ऐसी स्वाभाविक प्रक्रिया जिससे शायद ही कोई व्यक्ति अछूता हो। इंसान तो इंसान पशु-पक्षी भी संभोग के आनंद को भोगते हैं और संतान पैदा करते हैं। यदि संभोग केवल संतान उत्पत्ति के उद्देश्य से किया जाये, तो शायद आप इसका आनंद खुलकर न ले पायें, या फिर आप महसूस ही न कर पायें, क्योंकि ऐसी अवस्था में आपका एक मात्र लक्ष्य संतान पैदा करके माता-पिता का सुख भोगने का होता है, न कि संभोग का। स्त्री हो या पुरूष उम्र के एक पड़ाव में दोनों को संभोग की अनुभूति की लालसा होती ही होती है। दोनों इस आनंद को भोगने की इच्छा मन में रखने लगते हैं। किन्तु आज की भागदौड़ और अनियमित दिनचर्या के चलते व्यक्ति संभोग को केवल औपचारिकता समझने लगा है। संभोग के वास्तविक आनंद से दूर होता जा रहा है आज का व्यक्ति।
इस हिंदी लेख में हम बात कर रहे हैं स्त्रियों की संभोग से घृणा करने की, दूर रहने की या फिर संभोग की इच्छा ही न होने की।

स्त्रियों की ‘कामशीतलता’-

Sambhog Ka Tarika

कामशीतलता से अभिप्रया है सेक्स के प्रति ठंडापन, जोश न होना, प्रयास करने पर भी कामेच्छा न जागना।

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संभोग की प्यास-

संभोग से पूर्ण तृप्ति न पाने की अवस्था में जब स्त्री को स्नायुविक तनाव, निद्रा, की कमी, पाचन संस्थान के दोष, वायुगोला से उत्पन्न रोग भी हो जाये तो उसे तुरन्त लेडी डाॅक्टर एवं मनोवैज्ञानिक से सम्पर्क करना चाहिए। इस प्रकार उसकी मानसिक ग्रन्थि का कारण ज्ञात हो जायेगा, जिससे उसका उपचार करना सरल हो जायेगा।
कभी-कभी हंसी-खुशी के वातावरण में होने वाला विवाह केवल इस कारण असफलता पर जाकर समाप्त हो जाता है कि स्त्री शीतल होती है या उसे पूर्ण कामतृप्ति नहीं मिलती है। पुरूष भी अतृप्ति के कारण उससे खिंचा-खिंचा रहने लगता है। इस प्रकार उन दोनों के मध्य खाई बढ़ती जाती है। जबकि मामले को समझना और सूझ-बूझ से काम लेना ही असल समस्या निवारण है। एक-दूसरे को अधिक से अधिक मानसिक एवं शारीरिक संतुष्टि देना ही कामशीतलता को दूर करने के लिए सफलता की दलील है।

जिम्मेदार कौन?

स्त्रियों में कामशीतलता का विशेष कारण कभी-कभी पुरूष और केवल पुरूष ही होता है। विशेषकर शीघ्रपतन एवं वीर्य अल्पता का रोगी अपनी जीवन-संगिनी को कभी काम-तृप्ति नहीं प्रदान कर सकता है। ऐसे पति की पत्नी सुहागिन होते हुए भी विधवा से बदतर जीवन गुजारती है। ऐसे पुरूषों को किसी योग्य चिकित्सक से सम्पर्क करके सर्वप्रथम अपनी कमज़ोरी दूर करनी चाहिए। स्त्रियों की सेक्स के प्रति शीतलता, प्रेम और पूर्ण समर्पण की गर्मी से स्वयंमेव दूर हो जायेगी।
प्रत्येक अवस्था में पुरूष को ही दोषी ठहराना उचित नहीं है। बल्कि उसे नरमी के साथ समझाना चाहिए कि उसकी इच्छा के साथ-साथ उसकी पत्नी की इच्छा भी उसी से ओर केवल उसी से बंधी है। वह रतिक्रिया केवल लिंग प्रवेश को ही समझता है। यह उसकी भूल होती है, स्वार्थ नहीं। उसे सुलझे हुए अंदाज में बताना चाहिए कि ज़ोर आज़माई से अधिक स्त्री को पूर्ण काम-तृप्ति देना भी जीवन की एक महत्वपूर्ण कला है।

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उसके(स्त्रियों) कुछ कामोत्तेजक केन्द्र होते हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों में फैले हुए होते हैं। कामोत्तेजना को चरम शिखर पर पहुंचाने के लिए आवश्यक है कि पुरूष स्त्री की शारीरिक रचना से अधिक अधिक परिचित हो। समस्या के निवारण की कुन्जी यही है कि यदि स्त्री में कामशीतलता पुरूष के कारण हो तो उसे प्रेम की वर्णमाला बताई जाये ताकि वह आरम्भ भी वहीं से करें।
उसे सीधे जानवरों की भांति संभोग से बचना चाहिए। स्त्री पर शक्ति के बल पर अपनी मर्दानगी नहीं जतानी चाहिए, बल्कि प्यार, मुहब्बत का ऐसा वातावरण स्थापित करना चाहिए कि स्त्री स्वयं अपने मन-मंदिर का देवता आपको मानने लगे। डांट-डपट से किया गया संभोग, आपकी पार्टनर को संभोग से नफरत करने पर मजबूर कर देगा और इससे दूर होती चली जायेगी।

प्राक-क्रीड़ायें-

Sambhog Ka Tarika

प्रत्येक स्त्री में प्राकृतिक तौर से कुछ न कुछ भिन्न विशेषतायें होती हैं। कभी-कभी तो उसके कामोत्तेजक केन्द्रों का पता लगाना सरल होता है। परन्तु कभी-कभी बड़ी कठिनाई होती है, किन्तु प्रेम व स्नेह हर अवस्था में सहायक सिद्ध होता है।
यह स्मरण रखने की बात है कि ‘भगनसा’ में सर्वाधिक संवेदनशीलता होती है जोकि संभोग के समय स्वयंमेव महसूस होता है। इस स्थान के मर्दन से स्त्री की प्राकृतिक इच्छा अतिशीघ्र जागृत हो जाती है। चिकित्सा संबंधी ग्रन्थों में लिखा गया है कि इस स्थान को लिंग या अंगुलि से धीरे-धीरे खुजाया जाये तो स्त्री शीघ्र व्याकुल हो जाती है। यह योनि के किनारों के अंदर अर्थात् छोटे ओष्ठों के मिलाप से कमानी आकार के अंदर मूत्रछिद्र से लगभग 1 इंच ऊपर की ओर यह मटर के दाने के बराबर एक घुण्डी जैसी रचना होती है। सर्व कामांगों में कामसंवेदना या मनोउत्तेजना से प्रभावित होने वाला यह महत्वपूर्ण अंग है। कामोत्तेजना के समय तो इसको छूना विद्युत का बटन आॅन कर देने जैसा होता है।
वैज्ञानिक इसे पुरूषांग का ही प्रारूप मानते हैं। इसका निर्माण भी पुरूषांग की ही भांति स्पन्जी तन्तुओं से होता है। कामोत्तेजना के समय यह पुरूषांग की भांति कठोर और फैलकर बड़ा हो जाता है। इसमें पुरूषांग जैसी सुपारी भी होती है। कुछ स्त्रियों का यह अंग बड़ा भी होता है। उत्तेजना की अवस्था में डेढ़ इंच तक हो जाता है। भगनसा ही स्त्रियों को कामसंवेदित करता है। जिन स्त्रियों का यह अंग छोटा होता है, तो उनकी कामेच्छा भी कम होती है।
स्वस्थ स्त्रियों को कामोत्तेजना की चरम शिखर पर पहुंचाने के लिए इसे सबके बाद में छूना या घर्षित करना चाहिए। कामशास्त्रियों का कहना है कि लिंग के मुलायम सिरे से जब योनि के नरम दाने को छुआ जाता है तो स्त्रियों को विशेष आनंद की प्राप्ति होती है।
इसके अतिरिक्त अन्य कामोत्तेजक केन्द्र त्वचार के विभिन्न भागों पर फैले हुए होते है जैसे कमर, जांघों का भीतरी भाग, गर्दन, कान की लबें, निचले होंठ आदि। इसके अतिरिक्त स्तन, नितम्ब, कूल्हे, जांघें व नाभि इत्यादि तो परिचित स्थान हैं। संभोग से पूर्व और संभोग के मध्य इन केन्द्रों को छेड़ते रहना सर्वोत्तम कला है।
यद्यपि इनमें से प्रत्येक स्त्री में विशेषतः किसी केन्द्र से अधिक और किसी को कम उत्तेजना होती है। यह बिन्दु भी रखने याद रखने का है कि मासिक धर्म से पूर्व और तुरन्त पश्चात् स्त्रियों में संभोग की इच्छा बहुत अधिक होती है। अतः इस अवसर से लाभ उठाना चाहिए। इस प्रकार कामशीतलता दूर करने में बड़ी सहायता मिलती है। स्त्री को केवल कुर्सी का एक बेजान दस्ता समझना और उसकी कामेच्छाओं को महत्व न देना बहुत बड़ी भूल है।

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