Jane Kya Hai Sambhog karne Ki Vidhiyan जानें क्या हैं संभोग करने की विधियां

Jane Kya Hai Sambhog karne Ki Vidhiyan जानें क्या हैं संभोग करने की विधियां

Jane Kya Hai Sambhog karne Ki Vidhiyan

संभोग मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- (1.) अनुकूल रति, (2.) विपरीत रति।

1. अनुकूल रति- जब नायक-नायिका आमने-सामने होते हैं, नायिका नीचे उध्र्वमुखी(चेहरा ऊपर की ओर) और ऊपर से नायक अधोमुख(चेहरा नीचे की ओर) होता है। इसी स्थिति में रतिक्रिया जो सम्पादित होती है उसे ‘अनुकूल रति’ कहते हैं, क्योंकि इसमें नायिका के सभी कामोत्तेजक केन्द्र नायक के सम्मुख होते हैं। नायक के कामोत्तेजक केन्द्र भी नायिका के सम्मुख होते हैं। अन्य दृष्टियों से भी इसे अनुकूल ही मानना होगा, क्योंकि सन्तानोपत्ति की दृष्टि से और भी यह आसन सफल माना गया है।

रति आनंद(Joy of Inter Course) के विचार से भी इस स्थिति में नायक अपने लिंग से भंगाकुर का भी घर्षण सरलतापूर्वक कर सकता है। साथ ही पूरे लिंग को प्रवेश करके बार-बार धक्का मारकर नायिका को संतुष्ट भी कर सकता है। ये सभी गुण अनुकूल रति के ही हैं। चुम्बन, कुच मर्दन एवं लिंग प्रवेशादि सभी एक साथ होते हैं।

(2.) विपरीत संभोग- यह सेक्स(रति) अनुकूल रति के उल्टा(विपरीत) होता है। इसमें नायक शय्या पर उध्र्वमुख और नायिका अधोमुखी होती है। दूसरे शब्दों में नायक नीचे और नायिका ऊपर होती है। यह आसन रूचि के अनुसार मुद्रा परिवर्तन की दृष्टि से एवं अनुकूल रति में नायक के अधिक थक जाने से भी प्रयोग में लाया जाता है। क्योंकि संभोग में जो ऊपर होता है, उसे अपेक्षाकृत पहले थक जाना स्वाभाविक ही होता है। ऐसा इसलिए कि ऊपर से जो आरूढ़ होता है, उसे सुचारू रूप से सेक्स के सभी काम-क्रीड़ाओं को करते हुए अपने शरीर को भी संभालना पड़ता है। जब नायिका के आलिंगन में नायक बंधा होता है, तो उस समय की बातें कुछ और होती हैं। शेष अन्य समय की स्थिति तो वैसी ही होती है।
इस विपरीत रति का महत्व तब और बढ़ जाता है, जबकि नायक स्वयं थक चुका होता है और नायिका स्खलित नहीं हो पाती है। इस स्थिति में नायिका, नायक को नीचे लिटाकर, नायक की भांति स्वयं सक्रिय होकर सेक्स करती है।

अनुकूल रति से विपरीत रति- ये दो प्रकार से की जाती है।

प्रथम विधि- इस विधि में जब अनुकूल रति में संलग्न नायक-नायिक थक जाते हैं और आसन परिवर्तन करना चाहते हैं, तो सेक्स जारी रखते हुए नायक-नायिका का आलिंगन करते और बांहों में कसते हुए इस प्रकार पलटते हैं कि नायक स्वयं नीचे और नायिक ऊपर हो जाती है।

दूसरी विधि- जब नायक-नायिका सेक्स करने के बाद एक-दूसरे से अलग होकर पुनः नये सिरे से नायक नीचे होकर लेट जाता है और ऊपर से नायिका, लिंग को अपनी योनि में लेटी हुइ अवस्था में नायक पर आच्छादित हो जाती है, तो यह विपरीत रति की दूसरी विधि कहलाती है।

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विपरीत रति के भेद-

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विपरीत रति के 3 भेद हैं :- 1. संदश, 2. भ्रमरक और 3. प्रेंखोलित।
1. संदश- विपरीत रति की इस विधि में लिंग के योनि में प्रवेश करने के बाद नायिका अपनी योनिद्वार को सिकोड़ती है, जिससे नायक के लिंग की सुपारी पर दबाव पड़ता है। यह दबाव ऐसा होता है कि इस दबाव के प्रभाव से लिंग अग्रसारित होता है। दूसरे शब्दों नायिका अपने योनिद्वार को सिकोड़ती हुई, सुपारी पर दबाव देती हुई ऐसा प्रयास करती है जैसे कि योनि, लिंग को निगल जाना चाहती हो। इस प्रकार से मैथुन में लिंग पर जो दबाव पड़ता है, उससे एक प्रकार की आनंददायक पीड़ा होती है। अतः इसे सदंश विपरीत रति कहते हैं।

2. भ्रमरक- जिस प्रकार किसी कील या धूरी पर कोई वस्तु विशेष घूमती है, ठीक उसी प्रकार यदि नायिका, नायक के लिंग को योनि में डालकर चक्र की भांति वृत्ताकार पथ पर घूम आये तो इसे भ्रमरक विपरीत रति कहते हैं। इसमें नायक अपनी कमर वाले भाग को थोड़ा ऊपर उठाते रखता है, जिससे नायिका लिंग के अधिक से अधिक भाग को योनि में डालकर सरलता से चक्कर लगा सके।

3. प्रेंखोलित- यह भ्रमरक की ही परिष्कृत एवं परिवर्तित विधि है। इसमें नायिका के साथ-साथ नायिक भी सक्रिय होता है। नायक अपनी कमर को उठाये रखने के साथ-साथ कमर और कूल्हे को दांये-बांये, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे करते हुए गतिशील बनाये रखता है। यही प्रेंखोलित विपरीत रति है।
मैथुन अनुकूल हो या विपरीत, जो पक्ष(नायक या नायिका) अधिक सक्रिय होगा, उसे अपेक्षाकृत अधिक और पहले थकान होनी स्वाभाविक है। विपरीत रति में नायिका सक्रिय होती है, अतः उसे पहले और अधिक थकान होना स्वाभाविक है। इस स्थिति को भांप लेना एक योग्य नायक के लिए परम आवश्यक है। इस स्थिति का अनुभव होते ही नायक को चाहिए कि विपरीत आसन को अनुकूल आसन में बदल दें अर्थात् आलिंगन करते हुए बांहों में नायिका को कसकर पकड़ कर स्वयं ऊपर और नायिका को नीचे कर लें।

विपरीत रति की मुख्य विशेषताएं-

इसकी सामान्य विशेषता एवं आवश्यकता के संबंध में चर्चा की जा चुकी है। मुख्य विशेषता यह है कि विपरीत रति के अतिरिक्त सभी विधियां एवं सेक्ससन में नायिका अपनी कामोत्तेजना की भावना छिपाकर रख सकती है, लेकिन विपरीत रति में नायिका चाहकर भी अपनी कामोत्तेजना की भावना को छिपाये नहीं रख पाती है। यह उत्तेजना एक ऐसी अनमोल मोती है, जो दोनों पक्षों को लिए पूर्ण शांतिदायक होता है।

नोट- यदि नायिका अधिक मोटी हो, रजस्वला(मासिक धर्म की अवधि में) हो, गर्भवती हो, प्रसव के चार मास पूरे नहीं हुए हों, किसी प्रकार के संक्रामक रोग से योनि संक्रमित हो, तो विपरीत रति कदापि न करें। अन्यथा दोनों के लिए हानिकारक होगा।

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